भारत में अधिकतर वीर आजकल ऐसे क्यों पैदा हो रहे हैं जिनकी वीरता बस उनके परिवार, उनके पड़ोस, और अपने से कमज़ोर पर वीरता दिखाने में निकलती है। यहाँ तक की गर कही कुछ बोलना पड़े तब भी वो दुम दबाये ही नकार आते हैं। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा तो किसी से भी जहाँ मर्ज़ी बुलवा लो  मगर ये बेटी बचानी कैसे और कहाँ है ये तो इनसे ना ही समझा जाए तो शायद  ज़्यादा बेहतर होगा।
वैसे तो मुझे सदा से यही लगता है और यही मैंने अनुभव भी किया है की एक औरत को औरत से बचाने की ज़रूरत  कही ज़्यादा है।
कितनी बहुओं को उनको जेठ ,ससुर, देवर दुखी करते हैं ? अगर करते भी होंगे तो उनका मार्ग प्रशस्त करने वाली भी कोई औरत ही रही होगी। वरना हर घर में बस सास और ननदें ही होती हैं जो बहु को प्रताड़ित करती हैं।
हर लड़का जब पैदा होता है त कौन सबसे ज़्यादा ख़ुश होता है ? कौन पहली बेटी पैदा होने पर रोता है ? कौन बचपन ही से अपने बेटे को ये सिखाता है की तुझ में और लड़कियों में महानता का फ़र्क़ है; तू महान है और ये सब ले दे के मात्र इंसान है ।
जब हमारी बेटी किसी के घर बहु बन कर जाए तो हमें लगता है सब इसके कहने में चले। और दूसरे की बेटी हमारी बहु बने तो हम सोचते हैं ये हमारे कहने में चले।
जैसे ही नई बहु घर में आती है हर सास अपना समय भूल जाती है की कभी वो भी बहु बन कर नए परिवार में आई थी। उसे  बस अपना साम्राज्य बचाने की चिंता सताती है।
कौन बचपन ही से एक लड़के को ये एहसास करता है की उसका प्रभुत्व हर लड़की से जयादा है ? कौन  ये सोच कर चलता है की बुढ़ापे में लड़का ही उनका सहारा बनेगा ? कौन  सिखाता है लड़के को कि उसकी रोटी लड़की से जयादा पौष्टिक होनी चाहिये ?
वो कौन  है जो लड़की  तो हर संस्कार सिखाती है  और लड़का ग़लती करे तो बोलती है अरे ये   तो लड़का है। कम स कम संस्कार सिखाने   में तो भेद ना करो । शालीन तो लड़का भी होना ही चाहिये ।
जब तक हम सोच नहीं बदलेंगे ये नारे बेमानी हैं।
नारी को शक्ति मानने  वाला मेरा ये देश क्यों नारी को सशक्त करने से डरने लगा है ?
जिस देश में  दुर्गा और सरस्वती की पूजा की जाती है कौन वहाँ नारी को बराबरी का स्थान देने से डरता है ?
सोच बदलो ताकि कोई बाप अपनी बेटी को बोझ न समझे ।
सोच बदलो ताकि कोई बेटी को पैदा होने से पहले ही ना मारे ।
सोच बदलो कि कोई औरत को इस्तेमाल करने की वस्तु ना समझे।
सोच बदलो तभी तो देश बदलेगा ।

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